• प्रमोद अग्रवाल •

चैनल 9 . लाइफ/ भाजपा की केंद्र सरकार ने उत्तरप्रदेश सहित अगले आम चुनाव में जाति की वजह से हो सकने वाली हार की संभावना को यूजीसी के समानता नियम को सामने लाकर और उसे सुप्रीम कोर्ट के जरिये रोक लगवा कर टालने का शानदार सफल प्रयास किया है। बिहार में महिला वोट को नगद रुपयों का प्रलोभन देकर उनके वोट खरीदने के सफल प्रयोग के बाद अब पिछड़ों, अनुसूचित जाति /जनजाति के लोगों को वश में करने के लिये यूजीसी का यह प्रयोग आजमाया गया है।
देश में यूजीसी के नये नियम का सर्वाधिक विरोध उन्हीं राज्यों में दिखाई पड़ रहा था, जहाँ भाजपा की सरकारें हैं, इस विरोध को भारत के सभी मोदी गुणगान टीवी चैनल भी बराबर दिखा रहे थे। इसका साफ मतलब यह था कि सरकार चाहती थी ऐसा किया जाए। इसका सबसे बड़ा केंद्र उत्तरप्रदेश को बनाया गया, जहाँ प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी पीडीए के हित का सवाल उठा कर भाजपा को न केवल चुनौती दे रही है, वरन उसे लोकसभा चुनाव में पटखनी भी दे चुकी है।
इस आग को सुलगा कर भाजपा ने अपने ही समर्थकों के जरिए तीव्र विरोध करवाया, ताकि देश के पिछड़े और अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों में यह संदेश जाए कि सरकार तो उनका भला चाहती है, लेकिन उसका हमेशा से शोषक रहा सवर्ण समाज ऐसा नही होने देना चाहता। समाज तोड़ कर वोट एकत्र करने की इस कला का प्रदर्शन भाजपा देश में हिंदू-मुसलमान का वैमनस्य और दोनों के बीच नफरत फैला कर कर चुकी है और इस सफल प्रयोग के जरिए लगातार सरकार बनाने में कामयाब भी है।
उत्तर प्रदेश सहित देश में जातिगत मामलों का सबसे ज्यादा असर हिंदी भाषी क्षेत्रों में ही होता है और यूजीसी नियमों का भी सबसे ज्यादा विरोध इसी क्षेत्र में हो रहा है। इस नियम के जरिए यह जतलाने का प्रयास किया गया कि सत्ता देश में अलगाव नहीं होने देना चाहती, लेकिन वास्तव में इसके जरिए सत्ता ने पिछड़ों और जाति-जनजाति को यह सफल संदेश दिया कि यदि वे इस सरकार की तरफ रहते हैं, तो वह न केवल उनकी मुसलमानों से सुरक्षा करेगी, बल्कि उन्हे सवर्ण वर्ग के शोषण से भी बचाएगी।
देश में यूजीसी से सहायता प्राप्त संस्थानों मे लगभग तीन करोड़ छात्र पढ रहे हैं और अब तक प्रताड़ना के लगभग चार सौ मामले सामने आए हैं। यह संख्या इतनी बड़ी नहीं है कि इससे निपटने के लिए नये नियम बनाने पड़े। देश में उपलब्ध कानून के जरिए भी इनका अच्छा समाधान हो सकता है।
भाजपा को पता है पर पीड़ा के पोषण से गदगद सवर्ण वोट उससे किसी भी हालत में छिटक नहीं सकता और उसे संभालने के लिए उसके पास परम ब्राह्मण वादी संगठन आर एस एस मौजूद है लेकिन पिछड़ों और जाति-जनजाति वोटो पर उसे इतना भरोसा नहीं है। उत्तरप्रदेश में पिछली हार ने उसे सबक भी सिखाया था। संभवतः इसी कारण अब तक देश में हिंदू-मुसलमान कर रही इस पार्टी ने अगड़े पिछडे़ को लड़ाकर अपना उल्लू सीधा कर लिया है।
अपने कानून का अपने लोगों द्वारा विरोध करवाना, अपने ही लोगों के जरिए उसे अदालतों मे चुनौती दिलवाना और अदालत मे पक्षकार के तौर पर बिना विरोध किए नियमों पर स्थगन लगवाना एक बड़ी राजनीति का हिस्सा है, जो न केवल लामबंद हो रहे पीडीए, बल्कि जातिगत जनगणना के बाद उभरने वाले समीकरणो में भी सत्ता को लाभ पहुंचाएगा।


